“समस्त भारतीय संत समाज” संस्था की स्थापना की आवश्यकता
१. आज सम्पूर्ण विश्व में पंथवाद, जातिवाद, गद्दीवाद, डेरावाद, सम्प्रदायवाद इतना अधिक फैला हुआ है कि हमारे पूर्ववंशी संत- महापुरुषों द्वारा हमें पाखंडवाद, अंधविश्वासवाद, आडम्बरवाद से छुड़वाया गया था तो आज के महापुरुष (पाखंडी एवं नकली बाबा) उन्हीं संत- महापुरुषों की आड़ लेकर अपनी लालसा, कामना, बासनाओं के वशीभूत होकर अपनी इच्छापूर्ति के लिए उसी पाखंडवाद, अंधविश्वासवाद, आडम्बरवाद का प्रचार प्रसार कर रहे हैं और बेचारी भोलीभाली संगत का शोषण कर रहे हैं तथा एक- दूसरे के प्रति विरोधाभास विचारों का आदान- प्रदान करके चारों तरफ नफरत फैला रहे हैं।
२. जैसा कि हम देख रहे हैं कि अपने संतमत के ही साधू, महात्मा, महंत, संगत आदि एक पंथ विशेष, व्यक्ति विशेष, गद्दी विशेष, डेरा विशेष, महात्मा विशेष के दायरे में बंधकर रह गए हैं। इसलिए इस अज्ञान को देखते हुए मुझ दास के अंदर सतगुरु जी की असीम कृपा से एक प्रेरणा हुई कि संत-महापुरुष किसी भी धर्म/ जाति/ पंथ/ वंश विशेष के नहीं होते हैं, बल्कि वे तो सम्पूर्ण प्राणी मात्र के कल्याण के लिए ही इस मृत्यु लोक में आगमन करते हैं, लेकिन बड़े अफशोस की बात यह है कि हमारे उन पूर्वज संत- महापुरुषों को हमने धर्म/ जाति/ पंथ/ वंश/ सम्प्रदाय विशेष की सीमाओं में बंधते देख कर मुझ दास के मन में सतगुरु जी की असीम कृपा से एक चेतना जागृत हुई कि कोई भी संत-महापुरुष किसी भी धर्म/ जाति/ पंथ/ वंश/ संप्रदाय विशेष के नहीं होते हैं तो सतगुरु जी की प्रेरणा से मुझ दास के अंतर्मन में एक "सर्व सांझा मंच बने" ऐसा विचार जागृत हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप मुझ दास के मन में "समस्त भारतीय संत समाज" नाम प्रकट हुआ कि इस नाम से एक सर्व सांझी संस्था की स्थापना की जाए।
३. इसलिए इन सभी तत्वों से संगत को निकालने और हमारे वर्तमान के सभी संत- महापुरुषों, महात्माओं, महंतों, मठाधीशों, आचार्यों को एकत्रित करके सभी संत- महापुरुषों की सर्व- सांझी बाणी का प्रचार प्रसार करने के लिए "समस्त भारतीय संत समाज" संस्था की स्थापना मुझ दास (संतों के दास संतदास रत्तेवाल) के द्वारा ०९.०८.२०१७ में की गई है।